कॉलेज खत्म हुआ तो दोनों ने एक दूसरे से वादा किया कि जब भी उनकी शादी होगी, अगर किसी को लड़का हुआ और दूसरे को लड़की, तो दोनों ज़िन्दगी भर के एक रिश्तेदार बन जाएंगे। फिर वो कभी भी एक दूसरे से अलग नही होंगे। क्योंकि रिश्तेदार बिछड़ते नही है।
कॉलेज के बाद दोनों अपनी अपनी मंज़िल की तरफ बढ़ चले, दोनो सरकारी नौकरी करने लगे, नौकरी के बाद दोनों की शादी हुई, अब दोनो को इंतज़ार करने लगे कि कौन पहले बाप बनेगा।
रोहित ने जल्दी ही अमित को खुशखबरी दी कि वह बाप बनाने वाला है। अब दोनों ईश्वर से प्रार्थना कर रहे थे कि लड़का हो नही तो बड़ी लड़की से छोटा लड़का शादी नही करेगा।
प्रसव के दिन आ गया, अमित पहली गाड़ी पकड़ रोहित के घर आ गया। दोनो अस्पताल के बाहर इंतज़ारकर रहे थे कि रिजल्ट क्या होगा। तभी नर्स आयी और बोली कि दिव्या के पति कौन है?
तभी अमित, रोहित हो बुलाता है कि उसे नर्स बुला रही है। रोहित को नर्स अपने साथ ले गयी, थोड़ी देर बाद जब रोहित बाहर निकल तो खुशी में चिल्लाता हुआ बोला, बेटा हुआ है।
अमित की भी खुशी का कोई ठिकाना नही था।
अबकी बारी थी अमित की, लाख कोशिशें करने के बाद उसे संतान की प्राप्ति नही हो पा रही थी। देश के कोने कोने में घूम घूम कर थक गए थे। पर कुछ हासिल न हुआ। तभी एक आयुर्वेदिक डॉक्टर मिला जिसने उनके अंदर उम्मीद जगाई की वह कुछ कर सकता है।
इलाज चालू हुआ। रिजल्ट आने में 6 महीनों से ज़्यादा लग गए। पर एक दिन खुशखबरी आयी की अब अमित भी बाप बनाने वाला है। रोहित मिठाई की पूरी टोकरी लेकर अमित से मिला।
अब इंतज़ार था कि लड़का होगा या लड़की?
घड़ी की सुनियाँ जैसे जैसे आगे बढ़ रही थी, दिलो की धड़कन भी उतनी ही तेज़ थी।
तभी फिर से वही मंज़र दोहराया गया, नर्स आयी और बोली, कामना के पति कौन है। अमित भागता हुआ गया, थोड़ी देर बाद वापस आया है चिल्ला कर बोला।
बेटी हुई है.....
अब से हम समधी..
दोनो दोस्तो में खुशी का कोई ठिकाना नही रह।
मिठाइयां बटवाई गयी।
छट्ठी बरही में क्या धूम थी बिटिया की।
दोनो दोस्तो के परिवार वाले इकट्ठा थे, सबको बताया गया कि जब दोनों बच्चे बड़े हो जाएंगे तो हम दोनों की शादी करा देंगे और हम समाधी बन जाएंगे।
वक्त बीत रहा था अब दोनों दोस्त अपने अपने कामो में व्यस्त हो गए, और बच्चे भी धीरे धीरे बड़े हो रहे थे। साल में एक दो बार परिवार इकट्ठा हो जाता था।
बच्चो को अभी अहसास नही था कि दोनों की शादी पहके से तय है, दोनो दोस्त की तरह बड़े हो रहे थे। तभी अमित का ट्रांसफर कही दूर दूसरे प्रदेश में हो गया। अब दोनों का मिलना बहुत ही मुश्किल हो गया था।
राघव जो कि लड़के का नाम था और शिखा लड़की का नाम है। राघव पढ़ने में तेज़ और होशियार था। जबकि शिखा नाज़ों से पाली थी, हर नखरे उठाये गए थे, नखरीली थी, पढ़ना तो उसके बस की बात नही थी, राजकुमारी की तरह पाली होने के कारण उसके मिज़ाज़ भी गर्म थे।
उधर राघव तेज़ तर्रार, बुद्धिमान था , घर के सामने रहने वाले कपिल को राघव से बहुत ज़्यादा प्रतियोगिता थी। नंबर दोनो के ठीक ही आते थे, राघव अपनी पढ़ी पूरी कर रात में अपने कमरे की लाइट जल कर दूसरे कमरे में सो जाता था। कपिल को अक्सर लगता था कि राघव रात भर पड़ता है तो वो भी रात भर पड़ता था। सुबह स्कूल में कपिल को नींद आती रहती थी। और राघव बड़े आराम से दोस्तो के साथ मस्ती करते हुए क्लास करता था।
राघव ने पढ़ाई पूरी की, और इंजीनियरिंग करने के बाद नौकरी की तलाश करने लगा, तभी रोहित ने एक दिन राघव को बताया कि उसकी शादी तय कर दी थी उसके बचपन मे ही, लड़की का नाम शिखा है।
तभी राघव ने बोला वही अमित अंकल की बेटी शिखा, रोहित ने बोला हाँ वही। राघव ने बोला लड़की ठीक है पर उसे पसंद नही है पत्नी के रूप में। रोहित गुस्से से आग बबूला हो गया। राघव को खूब खरी खोटी सुनाई, और बोला तुम्हारी शादी तो वही होगी, जल्दी से नौकरी ढूंढो और शादी करो। इसके अलावा कुछ नही सुनना है।
राघव ने नौकरी की तलाश जारी की, पर नौकरी थी जो कि मिल ही नही रही थी। साल भर बीत गया नौकरी हाथ न लगी पर प्रयाश जारी रहा।
रोहित ने अमित से मिलकर, रश्मो पर चर्चा करने के लिए उसके घर पहुँचा, साथ मे राघव की चचेरी बहन इंदिरा भी थी। जब परिवार इकट्ठा हुए तो इंदिरा ने अपनी होने वाली भाभी से कुछ प्रश्न पूछने की अनुमति मांगी, राघव ने ही प्रश्नों की लिस्ट इंदिरा को सौपी थी, जैसे जैसे इंदिरा प्रश्न पूछ रही थी शिखा का पारा चढ़ता जा रहा था। एक प्रश्न पर शिखा के सब्र का बांध टूट गया, इंदिरा को ऐसे खरी खोटी सुनाई की रोहित आश्चर्य में खड़ा हो गया। इधर इंदिरा और राघव शांत बैठे रहे।
शिखा का यह रूप देख सब चकित थे, दूसरे ही दिन रोहित ने घर वापसी कर ली।
घर आते ही राघव की माँ दिव्या ने मोर्चा संभाला, रोहित और दिव्या जम कर बहस शरू हुई , दिव्या ने साफ मन कर दिया शिखा को बहू बनाने से, पर रोहित के सपना था कि बच्चो की शादी करा कर रिश्तेदार बने।
सपना जब टूटता है तो बहुत दर्द होता है।
अमित बार बार फोन कर शिखा द्वारा की गई गलती की माफी मांग रहा था। शिखा से भी माफी मनवाई गयी, पर शिखा अपने ही रंग में थी।
रोहित ने एक बार और कोशिश करने की कोशिश के पर दिव्या अपने निर्णय से टस से मस नही हो रही थी। रिश्तेदारी को बुलाया गया कि किसी तरह दिव्या मान जाए, पर ऐसा हो न सका और अब यह आलम है कि रिश्ता टूटने की कगार पर था, बचपन की दोस्ती आज अंतिम सांस ले रही थी।
रोहित ने राघव को पास बुलाया और उसे भी समझने की कोशिश करी, राघव ने भी मना कर दिया। तनाव में रोहित की ताभियत खराब होने लगी, समझ ने आ रहा था कि अमित को कैसे मना करे।
महीनों चली वार्ता के बात रोहित ने थक हार कर अमित को फ़ोन पर मना किया कि हम रिश्तेदार नही बन पाएंगे। अब दोनों की दोस्ती टूट चुकी थी, बचपन का दोस्त अब बिछड़ गया था।
रिश्ता टूटने की खबर जब राघव को लगी ना थी कि उसकी नौकरी लग गयी, एक नही दो दो।
राघव ने ट्रेनिंग के लिए दूसरे प्रेदेश जाने की अनुमति मांगी और निकल लिया अपने घर से दूर।
ट्रेनिंग में बिजी हो गया राघव, महीनों बीत गए राघव घर नही आया। इधर रोहित और दिव्या परेशान होने लगे। एक दिन फोन की घंटी बजती है और राघव बोलता है, माँ मेरी शादी है 10 दिन में आप आ जाना, मैं ट्रेन की टिकट भिजवा रहा हूँ।
रोहित को काटो तो खून नही, समझ नही आ रहा था कि क्या किया जाए, अपनी ही औलाद इतना बड़ा निर्णय ले रहा है और माँ बाप को बताया ही नही।
लड़की कौन है, किस कुल की है, किस समाज की है कुछ बताया ही नही बस शादी करने जा रहा है, यह सारे प्रश्न लेकर रोहित अपने छोटे भाई इंदिरा के पापा मोहित के पास पहुचे। उन्हें यह भी डर था कि कही किसी ने जादू टोना तो नही कर दिया है उनके बेटे पर।
पूजा पाठ भी कराया गया कि सारा जादू टोना खत्म हो जाये। मन्नते मांगी गई, धागे बंधे गए, अलग अलग चौखटों के दरवाजे खटखटाये गए, ना जाने कहाँ कहाँ सजदे किये गए। पर हुआ कुछ नही क्योंकि प्रेम था दोनो में।
राघव अपने चाचा की बात सुनता था। मोहित ने फ़ोन पर बात की राघव से, और बोला पहले घर तो आओ, लड़की की फ़ोटो दिखाओ, अगर लड़की अच्छी होगी तो मैं खुद भाई से बात करूंगा की लड़की को स्वीकार कर ले।
राघव राज़ी हो गया, छुट्टी ले राघव घर आया। साथ मे लड़की की फ़ोटो भी लाया। सारा परिवार इकट्ठा हुए, सबको फ़ोटो भी दिखाई गई, चाचा ने लड़की की फ़ोटो देखते ही कहा कि वाह!!! क्या पसंद है लड़के की !!
नाम पूछने पर पता लगा कि लड़की का नाम शक्ति है। तभी चाचा के मुझ से निकला।
शक्ति में भक्ति या भक्ति में शक्ति
लड़की तो बहुत ही सुंदर है, भाई साहिब तो सात जन्मों तक ऐसी लड़की ढूँढते, तब भी नही खोज पाते। हमारी बिरादरी और जान पहचान में ऐसी कोई लड़की है ही नही। पर माँ बाप को वो पसंद नही आई, उन्हें लगता था कि लड़के को लड़की ने जाल में फसा लिया है, नौकरी लगी नही की लड़का हाथ से गया।
इंदिरा को भी बहुत उत्सुकता हो रही थी कि भइया को भाभी मिली कैसे। तब शरू हुई प्रेम कहानी का विवरण।
किस्सा कुछ यूं है कि,
ट्रेनिंग के दौरान उनके मित्र के पैरों में चोट लग गयी, तो उन्हें हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया, मित्र से मिलने वो हर शाम जय करते थे, उनके बेड के बगल में एक और व्यक्ति जो कि उन्ही के आफिस में काम करते थे वो भी पैरो में चोट लगने के कारण भर्ती थे, हमारी होने वाली भाभी, उनकी बहन थी, वो भी अपने भाई की देख रेख के लिए वही रहा करती थी, भाई पहली ही नज़र में लट्टू हो गए, बस क्या था, उन्हें देखने और मिलने का बहाना ढूंढने लगा, इसी बीच, भाई ने उनके बारे में सब पता लगाया, जैसे कि
नाम क्या है।
कहाँ की रहने वाली है।
उनके परिवार में कौन कौन है।
कितनी पढ़ी लिखी है।
कितने भाई बहन है।
कोई बॉयफ्रेंड तो पहले से नही है।
जब सबकुछ पता लग गया और उनके भाई की हॉस्पिटल से छुट्टी हो गयी तो एक दिन उनके घर जा कर उनसे विवाह का प्रस्ताव रखा।
किसी अजनबी से कैसे कोई अपनी बहन का विवाह कर दे। फिर उन्होंने भी अपनी तरफ से तहिकीकात की, तसल्ली होने के बाद और बार बार आग्रह करने पर भाभी के घर वाले भी तैयार हो गए।
अब वक्त आया विवाह का, कोर्ट में जाकर विवाह करना तय हुआ, दहेज में कुछ भी ना लेने का निर्णय लिया राघव ने, उधर राघव ने अपने घरवालो को बताया कि इस दिन विवाह है, आप आ जाईयेगा नही तो आपके बिना भी शादी हो जाएगी।
घर मे हलचल मच गई।
लाख मनाने के बाद माता पिता ने माने, भाई भाभी के शामिल न होने पर चाचा ने भी अपनी असमर्थता जताई पर पूरा आशिर्वाद दिया। राघव के वापस जाने का समय हो गया था। राघव के बचपन बचपन के मित्र महेश उनके विवाह में शामिल हुए।
जब विवाह गो गया, तस्वीरे रोहित और दिव्या के पास भिजवाई गयी, और राजीव ने विवाह कर लिया है यह खबर पूरे मोहल्ले और बिरादरी में फैल गयी, तब जा कर रोहित ने फैसला लिया कि सामाजिक तौर पर इन दोनों को स्वीकार कर लिया जाए, नही तो बिरादरी में कही भी मुँह दिखाना मुश्किल हो गायेगा।
दिव्या ने राघव को फोन किया कि हम तुम दोनों को स्वीकार करते है, बहू को लेकर घर आओ हम बहू को सामाजिक रीति रिवाज से विवाह संपन्न कराएंगे और स्वीकार करेंगे।
छुट्टी ले राघव, शक्ति के साथ घर आया। पूरा खानदान स्टेशन लेने गया बहू को, घर पहुचते ही बैंड बाजा बजने लगा, खुशी की लहर दौड़ गयी।
पारंपरिक तौर पर विवाह कराया गया, रिसेप्शन हुआ, सबने वर वधू हो ढेर सारी शुभकामनाये दी।
सबकुछ अच्छे से होने के बाद भी रोहित-दिव्या, शक्ति को दिल से अपना नही पा रहे थे, दिव्या का व्यवहार तो ऐसा था जैसे शक्ति ने राघव को जादू टोने से फसा लिया है। बहू से इतनी उम्मीदे पाल रखी थी कि उसे पूरा करना बहुत ही मुश्किल था।
शक्ति अलग परिवेश में पाली थी, घर का काम करती तो थी पर वैसे नही जैसे दिव्या चाहती थी, खाना बनाने में वो दिव्या का स्टैंडर्ड से मैच ही नही कर पा रही थी, शक्ति के हर काम पर तंज बहुत ज़्यादा ही हो रहा था।
राघव और शक्ति के बीच मित्रवत व्यवहार भी रोहित और दिव्या को पसंद नही आ रहा था, दिव्या चाहती थी कि शक्ति पारंपरिक पत्नी जैसा व्यवहार करें। सुबह उठे, राघव और हमारे पैर छुए। घूँघट करें, पायल पहने और पैरों से छन छन की आवाज़ आये।
शक्ति पूरा प्रयास कर रही थी कि वह अपनी सास का दिल जीत सके पर लाख कोशिश करने के बाद भी ऐसा हो न सका, और एक दिन रागव ने हवाई जहाज का टिकट कटाया और उड़ गया अपनी पत्नी के साथ हमेशा के लिए।