इस ब्लॉग में मेरे निजी विचार है। मैं इस ब्लॉग में अपने विचार व्यक्त करता हूँ और दुनिया से अपना विचार शेयर करता हूँ।
Wednesday, May 24, 2023
अंतिम विदाई- माँ तू अमर रहे।
Saturday, May 13, 2023
ना बड़ा न छोटा और ना ही माझिल
Wednesday, May 10, 2023
गवार औरत
ढोल गंवार शूद्र पशु नारी।
सकल ताडना के अधिकारी।।
तुलसीदास द्वारा रचित ऊपर लिखी पंक्ति उस समय और घातक हो जाती, जब कोई व्यक्ति नारी भी हो और गंवार भी उम्र भर कितना भी प्रयास करो ताडना से बच पाना असंभव है।
यह कहानी एक ऐसी नारी की है जिसे समाज के लड़का लड़की के भेद भाव मे पढ़ने नही दिया, स्कूल जाती तो थी पर गांव के लड़के पढ़ने नही देते थे, अक्सर उसे गहरे गड्ढे में धक्का दे दिया करते थे, एकलौती संतान होने के नाते घर वालो ने उसकी सुरक्षा के लिए विद्यालय जाना बंद करा दिया।
60 के दशक की बात है, लड़कियों का विवाह भी जल्दी हो जाता था। बिट्टू पढ़ तो नही पाई थी पर घर और बाहर के काम मे बहुत तेज़ थी। घर पर माँ का हाथ बटाती और बाहर पिता के साथ खेती भी देखती, बिट्टू को कहावते और चौपाइयां मुहजुबानी याद थी। अक्सर वह अपनी बातों में इन चौपाइयों और कहावतों का प्रयोग करती थी, सामने वाला बिट्टू की बातो को सुन मंत्रमुग्ध हो जाता था, 9 बरस की होते होते उसका विवाह एक पढ़ने लिखने वाले लड़के से कर दिया गया। विवाह तो 9 की उम्र में हुआ पर गौना 18 के होने पर हुआ।
लड़का पढ़ लिख गया और सरकारी नौकरी में भी पा गया, अब वह एक बिना पढ़ी लिखी लड़की से रिश्ता निभाए तो कैसे निभाए। अनपढ़ होने का मतलब गवार कहलाया जाने लगा, पर किसी तरह रिश्ता निभाया गया। लड़के की बहने भी अनपढ़ थी, बिट्टू को छोड़ने का मतलब भविष्य में लड़के की बहनो के पति भी उन्हें गवार कहकर छोड़ सकते थे। बिट्टू अपना पूरा प्रयाश करती की वो सबकुछ करे जो वह कर सकती है।
पति की सरकारी नौकरी लगी थी इसलिए गांव छोड़ शहर जाना पड़ा। बड़ा घरद्वार छोड़ कर बड़े से शहर के छोटे से घर मे रहना था। बिट्टू ने पूरा प्रयाश किया अपने आपको शहरी वातावरण में ढालने के लिए।
बच्चे हुए, उनका पालन पोषण किया , अच्छे संस्कार दिए, पर पति की नज़र में सिर्फ गवार की रही। कभी भी किसी के घर जाना हो तो पति उसे साथ नही ले जाते थे, बिट्टू को साथ ले जाने में उन्हें शर्म आती थी , शर्म आये भी तो क्यों ना? बाकी लोगो की पत्नियां पढ़ी लिखी जो थी, जिनकी पत्नियां पढ़ी लिखी नही थी, उन्होंने उन्हें त्याग कर दूसरा विवाह जो रचा लिया था।
बिट्टू के पति ने दूसरा विवाह तो नही किया था पर बिट्टू को गवार होने का अहसास अक्सर करा दिया जाता। बिट्टू भी तो पूरी तरह से अपने पति पर निर्भर जो थी। बूढ़े माता पिता की जिम्मेदारी भी बिट्टू के सर पर ही थी।
बच्चे बड़े हुए, एक अनपढ़ ने अपनी बिटिया को खूब पढ़ाया, घर का काम वो खुद करती पर बिटिया को पढ़ने से कभी नही रोकती, बिटिया भी खूब पढ़ी और सरकारी नौकरी पा गयी। बिट्टू अपनी बिटिया में अपने आपको देखती थी और हर बार यही सोंचती थी कि वो ना पढ़ सकी पर उसकी बिटिया पढ़ लिख कर अफसर बन गयी।
वक्त बदला पर बिट्टू के ऊपर से गवार होने का तमगा कभी न गया। कोई भी फैसला लेना हो उससे कभी नही पूछा जाता। बस फैसले सुनाए जाते। जब भी वो अपना विचार व्यक्त करने की कोशिश करती गवार कह कर बिट्टू को छुप करा दिया जाता।
बिट्टू अंदर ही अंदर टूट से गयी थी, इस टूटन से उसके स्वास्थ्य पर भी अब असर दिखने लगा था।
बिट्टू अब वृद्ध हो गयी थी, नानी बानी दादी भी बनी, बहुएँ पढ़ी लिखी आयी, जितना भी कुछ सीखा जीवन मे बहुओ को सिखा दिया, एक दिन बिट्टू, लंबी बीमारी से संघर्ष करते करते दुनिया छोड़ कर चली गयी। वह कुछ लेकर नही गयी, जाते जाते बस पति से माफी मांगते हुए गयी , कि अगर उससे कोई गलती हुई हो तो माफ कर देना।
जब भी कोई बिट्टू के दिवंगत होने पर शोक व्यक्त करने आता तो पति अक्सर चर्चा में बस यही बात दोहराता कि "गवार थी हमारा रिश्ता किसी तरह निभ गया। हमारे साथ के कई लोगो ने दूसरा विवाह किया पर मैंने नही किया"।
बिट्टू, पूरा जीवन संघर्ष करती रही सबकुछ किया जो किसी पत्नी और माँ को करना चाहिए, पर उसके जाने के बाद भी अपने ऊपर से गवार होने का तमगा हटा नही पाई। कुछ लोगो के लिए वो सिर्फ एक गवार ही रही।