अपने साले की सगाई निपटा, मै रेलगाड़ी से दिल्ली कें लिए रवाना हुआ। लखनऊ पहुंचने वाला था और आप पास बैठे सहयात्रियों से बात हो रही थी। तभी स्वाति ने पूछा हम कितने बजे गाजियाबाद पहुंचेंगे। मैंने कहा अगर सब ठीक ठाक रहा और ट्रेन लेट ना हुई तो, हम सुबह ३:३० तक गाजियाबाद पहुंच जाएंगे।
तभी स्वाति ने बोला अगर हम टाइम से पहुंच गए तो आदि को स्कूल भेज देंगे। आदि जो कि सीट पर ऊपर नीचे कर रहा था आया और बोला कि कल शायद मै थक जाऊंगा और स्कूल नहीं जा पाऊंगा। मै स्कूल फिर कभी और चला जाऊंगा।
पहले भी जब कभी भी आदि का स्कूल जाने का मन नहीं करता था तो बोलता है कि मुझे बुखार आ सकता है या मेरा पेट दर्द कर रहा है। पूछने पर कि क्या तुम्हारा पेट दर्द कर रहा है तो बोलता है कि नहीं, अभी नहीं पर स्कूल में कर सकता है।
इसी चर्चा में हमने बोला की आदि को सच और झूठ का मतलब भी नहीं पता है अभी। बच्चे सिर्फ बहाने बनाते है । सच या झूठ नहीं बोल पाते। तभी आदि बोलने लगा कि मै बहाने नहीं बनाता हूं और मै सच बोल लेता हूं।
स्वाति के पास आ कर आदि ने बोला कि मै "सच" बोल लेता हूं। तभी स्वाति ने बोला, सच क्या होता है जानते भी हो। ज़रा बोल कर दिखाओ। आदि बोला सच सच सच.. बताओ कितनी बार बोलूं सच। आप भी बोलो १०० बार सच। तभी स्वाति भी सच का जाप करने लगी। १० बार ही हुए थे कि आदि बोलने लगा बस हो गया १०० बार।