मैं कुछ दिनों से ऐसा महसूस कर रहा हूँ की, यदि आप किसी को ज्यादा सम्मान देते है, उसकी पसंद या न पसंद का ध्यान रखते है और हर काम करने से पहले उसकी सलाह लेते है और अपनी सफलता का कुछ श्रेय उसे देते है। तो एक दिन ऐसा आएगा जब वो आपका सम्मान करना बंद कर अपने आपको आपका भगवन या भाग्यविधाता समझ बैठेगा। वो भूल जाता है की जो व्यक्ति आपको सम्मान दे रहा है उसे भी सम्मान चाहिए । धीरे धीरे वो आपकी अर्जित सफलता को अपने अहसान के तले दबा देता है। फिर आप सम्मान करना बंद कर देते है।
फिर आता वो वक्त जब वो आपका सम्मान न पाकर झल्ला जाता है। फिर दौर शुरू होता है आपके अपमानो का, एक झड़ी सी लग जाती है आपकी आत्मा पर चोट करने की जो कभी खत्म नहीं होती।
"उसी का ईमा बदल गया है , कभी जो मेरा खुद रहा था "
फिर आता वो वक्त जब वो आपका सम्मान न पाकर झल्ला जाता है। फिर दौर शुरू होता है आपके अपमानो का, एक झड़ी सी लग जाती है आपकी आत्मा पर चोट करने की जो कभी खत्म नहीं होती।
"उसी का ईमा बदल गया है , कभी जो मेरा खुद रहा था "
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