Saturday, December 16, 2023

मृतुभोज और रिश्तेदार



 शहर से दूर किसी कस्बे में तीन भाई- बहन अपनी माँ के साथ खुशहाल ज़िन्दगी जी रहे थे।  पिता लंबी बीमारी के चलते पहले ही जा चुके थे।  पिता के जाने के बाद  माँ ने तीनों को संभाला, और तीनो ने माँ को। 

एक दिन माँ की अचानक तबियत खराब हो जाने के कारण, जब तीनो माँ को लेकर डॉक्टर के पास गए तो पता चला कि उन्हें एक अनुवांशिक बीमारी है। जिससे उनकी किडनी खराब हो गयी है, जो कभी ठीक नही हो सकती। 

इलाज के लिए तीनो माँ को बड़े शहर ले कर आये,  आनुवंशिकी बीमारी के कारण उनकी शारीरिक स्थिति दिन पर दिन खराब होती जा रही थी।  तीनो डॉक्टर्स  के चक्कर लगा रहे थे की उनकी किडनी की बीमारी ठीक हो सके। जहाँ भी उम्मीद की कोई किरण दिखाई देती, तब झट से तीनो दौड़ पड़ते।  

डायलिसिस के लिए तीनो रोज़ चक्कर लगते की जहाँ भी अच्छे से हो जाये, बस करा दे।  इलाज में पैसे पानी की तरह बह रहे थे, आर्थिक इस्थिति अच्छी ना होने के बाद भी हर संभव प्रयाश कर रहे थे की माँ को अच्छे से अच्छा इलाज मिल जाये।  कोशिश करते करते वो माँ को लेकर तीनो पी.जी.आई पहुंचे।  रिश्तेदारों को पता लगा तो एक एक कर के आए और अपनी व्यहारिकता पूरी करते हुए अपने घर को वापस निकल लिए।  किसी ने उनसे आर्थिक सहयोग के बारे में कुछ नहीं किया। फिर भी तीनो ने पैसो का जुगाड़ कर, माँ का हर सम्भव इलाज कराया।

माँ का संघर्ष काफी दिन चला, और कुछ सगे रिश्तेदार जो उनके घर के आस पास ही रहते थे वो आये ही नही मिलने ।  
अस्पताल में माँ के अंतिम सांस लेने के बाद, तीनो अपने आपको ठगा महसूस कर रहे थे, की इतनी मेहनत के बाद भी, उन्हें बचा नहीं पाए।  

अंतिम विदाई के लिए उन्हें उनके निवास पर ले जाने का इंतज़ाम किया गया। माँ को लेकर सब देर रात घर पहुंचे।  रिश्तेदारों ने अंतिम विदाई का इंतज़ाम पहले से कर रखा था।  पूरा कार्यक्रम ठीक से निपटा।  शोक में डूबे तीनो इस हालत में नहीं थे की कुछ बात कर सके।  

 दिन बीतने के बाद रिश्तेदारों ने मृत्युभोज की बात करने के लिए तीनो के पास गए, पर तीनो ने आर्थिक इस्थिति अच्छी ना होने के कारण मृत्युभोज की जगह शांति पाठ के लिए प्रस्ताव दिया, पर परंपरा के नाम पर रिश्तेदारों  ने मृत्युभोज करने की ही बात कही, और बोला की तुम जितना कर सकते हो आर्थिक सहयोग करो बाकि हम मिलकर इंतज़ाम कर लेंगे।  

सहयोग मिलने पर तीनो तैयार हो गए, यह भी कार्यक्रम ठीक से निपटा। भोज करने बहुत कम लोग आए। मुझे भी समझ नही आ रहा था कि कोई परिजन शोक में हो और उस शोक में वह सबको अपने घर भोज पर बुलाये, जो पैसा इलाज पर खर्च किया जा सकता था वह दावत में खर्च हुआ। खाना इतना बना था की रेलवे स्टेशन और बस स्टेशन जाकर ज़रूरत मंदों को बाटना पड़ा।  फिर भी खाना बच गया।  बासी खाना कौन खाता है, सो वह फेकना पड़ा। 

सबसे विकट इस्थिति तो ब्राम्हण भोज में थी, दान के लिए ऐसे बहस कर रहे थे जैसे किसी शादी समाहरोह के बाद हिजड़े आते है और नेग के लिए मोल तोल करते है। 

जो भी रिश्तेदार शोकाकुल से मिलने आये थे और रिश्तेदारों के सहियोग की बात सुन बहुत प्रसन्न थे पर मेरे मन में एक बात अंदर अंदर खटक रही थी, की इलाज में किसी ने भी आर्थिक सहियोग नही किया पर मृतुभोज के लिए सब तैयार हो गए।

कुछ दिन बीते, तीनों अपने आपको संहलते हुए आगे बढ़ रहे थे कि एक दिन रिश्तेदारों ने उन्हें बुलाया और बिल पकड़ा दिया। तीनो बिल देख समझ नही पा रहे थे कि यह क्या है?
तभी एक सज्जन व्यक्ति बोलते है कि मृतुभोज करने के लिए हमने उधार दिया था दान नही। 

रिस्तेदारो में से एक ने बोला, इतना खर्च हुआ है मृतुभोज पर कृपया इसका भुकतान कर दे हमे आगे की उधारी चुकानी है। तीनो समझ नही पा रहे थे कि क्या किया जाए। सहियोग उधार नही होता है, रिश्तेदारों को समझाने के बाद भी राशि का भुकतान जल्दी से जल्दी करने पर अडिग रहे । 

तीनो अपने आपको ठगा महसूसकर रहे थे। इलाज में कोई सामने नही आया। देखने भी नही आया पर स्वर्गवास के बाद सब आये। जिसने जो भी सहयोग किया वह भी उधार था। 

समाज मे कुछ रिश्तेदार आपके सही वक्त पर सही घाव दे जाते है बस उसे बोला नही जा सकता। बस अंदर ही अंदर घुटन दे जाते है। 



Saturday, December 9, 2023

एक अनकही मौसी और मुँह का बोला मामा


साल खत्म होने को बस एक महीना ही बचा है। आफिस की एक मीटिंग में हम चर्चा कर रहे थे कि नए साल में  क्या लक्ष्य साधा जाए,  AI का प्रभाव हमारे आने वाले भविष्य पर क्या होगा, चैट जी.पी.टी और गूगल बार्ड अब हमारे जीवन का हिस्सा बनते जा रहे है और आगे आने वाले भविष्य में AI क्या परिवर्तन लाएगा, अभी इसका अंदाज़ा भी नही लगा सकते। AI अब ऐसे ऐसे काम सेकंडों में कर रहा है कि बीते कल में उसी काम में घंटो या महीनों लग रहे थे। 

चर्चा चल ही रही थी कि पापा का फ़ोन आया, मीटिंग में होने के कारण मैंने फ़ोन नही उठाया। मीटिंग खत्म होने के बाद जब मैंने उन्हें कॉल किया तो पता चला कि, हमारे नाना नानी द्वारा बनाये गए उनके घर, उनके ही रिश्तेदार जबरदस्ती कब्ज़ा कर के उसपर मकान बनाने की तैयारी कर रहे है। 

तभी हमारे दिमाग मे यह विचार आया कि हम एक वर्चुअल वर्ड में रह रहे है। दिमागी बाहुबल और शारीरिक बाहुबल में बहुत अंतर है। पढ़ लिख कर हम भविष्य बुन रहे है और कोई बिना पढ़े अतीत खाये जा रहा है और जड़े खोखली कर रहा है। 

पिता जी के अनुसार, कल हमे तड़के ही घर से ननिहाल जाना है। रात भर इसी तनाव में की कोई हमारे घर पर जबरदस्ती कब्ज़ा कर रहा है। नाना नानी उम्र भर आभाव में रह कर तिनका तिनका जोड़ कर घर बनाया, और आज उनके स्वर्गवास के बाद उनकी जमीन पर एक अनाधिकृत व्यक्ति कब्ज़ा कर रहा है। 

रात आंखों में कटी, सुबह हम तैयार होकर निकल पड़े ननिहाल। रास्ते भर हम पापा से नाना-नानी और माँ की चर्चा करते रहे। तीन-चार घंटो की यात्रा करने के बाद हम ननिहाल पहुचे। कार से उतरते ही हम देखते क्या है कि उन्होंने हमारे घर का लगभग आधा हिस्सा कब्ज़े में कर लिया है। छत डालने के पूरी तैयारी है। वक्त रहते हमे पता चल गया नही तो पूरा भी कब्ज़ा हो जाता।  माँ की बहन के पति ने पापा को फ़ोन किया था और कब्ज़े की जानकारी दी थी। 

मैंने अपनी माँ की बहन को उनके रिश्ते से कभी नही बुलाया। मेरे पैदा होने से पहले से ही हमारे परिवारों में अनबन थी। कानूनी तौर पर ननिहाल की संपत्ति, माँ के नाम पर थी और उनके जाने के बाद हम भाइयो में बटी। 
जिनके बेटे ने हमारी ननिहाल की संपत्ति पर कब्ज़ा किया था उन्हें हम मामा बुलाते है। 

पापा ने जब मामा से बात की, कि तुमने ऐसा क्यों किया। हम तो आप पर विश्वास करते थे कि मेरी संपत्ति आपके सामने कोई और कब्ज़ा नही कर सकता है। दुसरो की बात छोड़िये आप ही ने कब्जा कर लिया है। 

पुत्र मोह से ग्रसित मामा का जवाब आता है कि कभी कभी नियत में खोट आ जाता है। लोग एक दूसरे की संपत्ति कब्ज़ा कर लेते है, समझ लीजिए, वैसे ही मैंने भी कब्ज़ा कर लिया है आइये हम समझौता कर लेते है। थोड़े बहुत पैसे बनते है इस जमीन के, वह ले लीजिए और मामला खत्म करिए। 

पापा ने जवाब किया कि अगर हमे बेचना ही होता तो बरसो पहले बेच दिया होता पर यह संपत्ति बच्चो की नानी की निशानी है, यह दोनों बेचना नही चाहते है। तभी मेरी माँ की बहन आकर मामा से भिड़ जाती है कि यह संपत्ति मेरी माँ की है। हम आपस मे कितना भी लाडे यह हमारे घर का मुद्दा है। हम दोनों की लड़ता देख आपने हमारा हिस्सा की हड़प लिया। 

हम भी भवचक्के रह गए। पर बात तो सही ही कह रही थी। समय मिलने पर हमने पापा से बात की कि उन्हें भी संपत्ति में बराबर का हिस्सा दे कर अपने दिल का बोझ हल्का करो। परिवार से चर्चा कर हमने उन्हें बोला कि आधा हिस्सा तुम्हारा और आधा हमारा। 

चेहरे पर खुशी का अहसास साफ दिखाई दे रहा था। एक ही पल में मानो 47 साल की गिले शिकवे खत्म हो गए । ज़िन्दगी में पहली बार उस अनकही मौसी हो हमने मौसी कहा और पैर छुए। 

हमदोनो का समझौता देख मामा के पैरों तले जमीन खिसक गई हो हमने  ऐसा प्रतीत हो रहा था। मकान बनाने का काम रुकवाया गया। फिर शरू हुआ पुलिश और अदालत का सिलसिला।

मामा और उनका पुत्र हमसे कही आगे थे। पुलिस को पहले से ही जानकारी थी। कि क्या होने वाला है। हमारी ज़मीन को अपना बता पहले से तैयार थे। 

SDM को भी एप्लीकेशन दे कर आर्डर निकलवा लिया था। हमारे पीठ पीछे सारा खेल हो चुका था। अब हमे दर दर भटकना पड़े, इसका पूरा खेल रचा जा चुका था ।अपनी ही संपत्ति पर दावा करने के लिए सारे रास्ते पहले से ही बंद हो चुके थे। 

पुलिस और प्रशासन ने निवेदन करने पर भी कोई सुनवाई नही की। कुछ लोगो के सहयोग से हमने स्टे मिला। 
मौसी को घर छोड़ गया। उनका घर हमारे पैतृक निवास से 500 मीटर भी नही होगा, गाँव एक ही है। इतनी से दूरी तय करने में चार दशक लग गए।  माँ के जाने के बाद उनके जैसा पहली बार कोई मिला जो उनके जैसा है। जिन्हें हम ज़िन्दगी भर मामा बोलते रहे और समझते रहे, उन्होंने अपना अलग ही रंग दिखाया।