स्कूल के दिनों में, जब मेरे या मेरे भाई के बैग से कभी भी गलती से किसी और का इरेज़र, कटर या पेंसिल निकल आये, तो उस रात माँ सुल्ताना डाकू की कहानी ज़रूर सुनाती थी।
माँ की सुल्ताना डाकू की कहानी में वह एक खूंखार डाकू हुआ करता था । बड़े बड़े राजा, महाराजा और शहर के अमीर लोग उससे खौफ खाते थे। जिस घर मे वो डकैती डालता था उसे पहले ही बता देता था, इस दिन उसके घर डकैती डालने आएगा। लोग डर के मारे अपना सारा कीमती सामान उसके हवाले कर देते थे। अगर गलती से भी किसी ने उससे कुछ छुपाने की कोशिश करता तो उसे जान से मारने में सुल्ताना ज़रा सा भी नही सोचता था। जिधर भी वो निकल जाता डर के मारे सारे लोग अपने घरों में कैद हो जाते थे। हर तरफ सन्नाटा पसर जाता था। लाखो कोशिशें करने के बाद, जब एक दिन पुलिस ने उसे पकड़ा और अदालत ने पेश किया गया, तब गवाहों और सबूतों के आधार पर अदालत ने उसे मौत की सज़ा सुनाई।
उसे फांसी पर चढ़ाने से पहले जब जेलर ने उससे उसकी अंतिम इच्छा के बारे में पूछा गया, तब सुल्ताना ने अपनी अंतिम इच्छा में अपनी माँ से मिलने की इच्छा जाहिर की। जेलर ने सुल्ताना की माँ को बुलवाया और सुल्ताना से मिलवाया।
जब सुल्ताना अपनी माँ से मिला, तब वह माँ के गले लग कर रोने लगा, मौत का डर उसकी आँखों मे साफ नजर आ रहा था। माँ से बात करते समय भी उसकी ज़ुबान लड़खड़ा रही थी। सुल्ताना की माँ भी अपने बेटे को फाँसी की सज़ा से काफी दुखी थी। फूट फूट कर रो रही थी और जेलर से माफी की गुहार कर रही थी। माँ बेटे का विलाप देख जेलर भी भावविभोर हो रहा था।
मिलने का जब वक्त पूरा हुआ और जेलर ने सुल्ताना की माँ को जाने के लिए कहा, इतना सुन माँ बेटे की रूदन और तेज़ हो गया। जब अंतिम बार सुल्ताना अपनी माँ के गले लगा, तो उसने अपनी माँ के कान काट लिए। साथ ही खड़े जेलर ने उसकी माँ को सुल्ताना से छुड़ाया।
सभी यह देख कर दंग थे कि सुल्ताना ने ऐसा क्यों किया। अभी कुछ ही पल पहले सुल्ताना अपनी माँ के गले लगकर रो रहा था, उसके क्यों अपनी माँ के कान काट लिए। तभी सुल्ताना ने अपनी माँ से बोला , जिस दिन मैंने अपने बचपन मे अपने दोस्त की पेंसिल चराई थी अगर उस दिन खुश होने की जगह, मुझे थप्पड़ मारा होता। मेरी छोटी मोटी चोरियों पर मुझे सज़ा दी होती। तो आज मैं यूँ फाँसी के तख़्ते पर झूलने नही जा रहा होता।
अपनी माँ को ऐसा बोल कर सुल्ताना फाँसी पर चढ़ने के लिए निकल जाता है।