कुछ बरस पहले की यह बात है, जब हम नवरात्रि के समय अपने मित्र के साथ रामकृष्ण मिशन गए थे, जो कि लखनऊ में है। दुर्गा पूजा देखने के बाद, जब हम अपने परिवार एवं मित्रों के साथ परिसर का भ्रमण कर रहे थे, तभी अचानक एक व्यक्ति सामने आता है और बोलता है कि तुम राहुल हो न।
मैंने बोला, हाँ, मैं राहुल हूँ।
फिर वह बोलता है कि अगर तुमने मुझे पहचान लिया तो ठीक है, नहीं तो मैं तुम्हारे रास्ते से हट जाऊँगा।
समझ नहीं आ रहा था कि ऐसा कौन है जो मुझे जानता है और इतने आत्मविश्वास से मिल रहा है। तभी कुछ मिनट सोचने के बाद मुझे याद आया उसका चेहरा। वह कोई और नहीं, हमारे स्कूल के दिनों का मित्र था। बीस सालों से भी ज़्यादा समय हो गया था उससे मिले। नाम याद करने में थोड़ी तकलीफ़ हो रही थी। थोड़ी जद्दोजहद करने के बाद मुझे उसका नाम याद आया।
नाम था अमरनाथ। मेरे पहचान लिए जाने के बाद वह खुश हुआ और हमने अपने नंबर एक-दूसरे से साझा किए। रास्ता तो छोड़ दिया था उसने, फिर कभी मिलने का वादा कर वह चला गया। मैं भी आगे बढ़ चला मंदिर परिसर घूमने और प्रसाद लेने के लिए।
वक़्त बीतता जा रहा था और मुझे याद ही नहीं रहा कि कभी उसे मिला था। दो बरस के बाद अचानक कॉन्टैक्ट डिटेल्स देखने पर अमरनाथ का नाम दिखा, जिससे न तो दोबारा मिलने की कोशिश की और न ही कोई संदेश भेजा।
2025 के दिसंबर के आख़िरी दिन चल रहे थे। एक दिन मैंने अपनी फटफटिया उठाई और निकल लिया उसके घर की तरफ। बीस साल पहले का मोहल्ला आज बहुत बदल गया था। एक-मंज़िला मकान अब कई-मंज़िला हो गए थे। घरों के बाहर की बनावट भी बदल चुकी थी। सभी घरों की ज्यामिति बदल जाने के कारण उसका घर मुझे नहीं मिला। मैं वापस आ गया। फिर घर से मैंने उसे फ़ोन मिलाया। एक बार में न उठा तो दोबारा फ़ोन मिलाया। फ़ोन उठा और मैंने बोला, “अमरनाथ!”
उधर से आवाज़ आई, “हाँ भाई राहुल, क्या हाल है?”
बात शुरू हुई कि हम मंदिर में मिले थे, फिर दोबारा मौका ही नहीं लगा कि मिल सकें। मैंने पूछा, “कहाँ हो तुम?”
उधर अमरनाथ बोला, “भाई, अभी तो मैं कानपुर में हूँ। कभी-कभी वीकेंड पर घर आता हूँ। इस वीक घर जाऊँगा तो कॉल करता हूँ।”
मैंने बोला, “हाँ भाई, घर पहुँचना तो कॉल करना।”
दुआ-सलाम के बाद फ़ोन रख दिया। नया साल आया, फिर मैंने मोबाइल पर संदेश भेज नए वर्ष की बधाइयाँ दीं। अमरनाथ की तरफ से कोई संदेश नहीं आया, तो आगे बात हुई ही नहीं। मैं भी नए वर्ष के बाद अयोध्या अपनी ससुराल आ गया, एक फ़ंक्शन के मौके पर।
तभी स्कूल के ग्रुप में एक मैसेज देखा—किसी का शोक संदेश। पढ़ते ही मेरी हवाइयाँ उड़ गईं। दिल बार-बार यही कह रहा था कि यह वह नहीं है, कोई और होगा। फ़ोन में उसकी फोटो देखनी चाही, तो डीपी में उसके बच्चों की फ़ोटो थी। चेहरा समझ नहीं आ रहा था। तभी मैंने अपने मित्र दिवान को कन्फ़र्म करने के लिए फ़ोन किया। दिवान भी घर से बाहर गया हुआ था। बात सुनकर वह भी चकित था। थोड़ी देर बाद फ़ोन करने को कहकर उसने फ़ोन काट दिया।
कुछ पल बीते न थे कि फ़ोन फिर आया। बोला, “भाई, यह वही है जो तुम्हें मंदिर में मिला था।” सदमे में वह भी था। “शरद से बात करने को बोल रहा हूँ,” कहकर फ़ोन काट दिया। मुझे अभी भी यक़ीन नहीं हो रहा था कि वह यही अमरनाथ है। फ़ोन हाथ में था ही, तभी मैंने काँपते हुए हाथों से फ़ोन मिलाया कि शायद अमरनाथ ही फ़ोन उठाए।
तभी उधर से एक काँपती हुई आवाज़ आई, “जी, बताइए।”
मैंने बोला, “क्या अमरनाथ से बात हो सकती है? मैं उसका बचपन का दोस्त राहुल बोल रहा हूँ।”
उधर से आवाज़ आई, “अब वो तो नहीं रहे।”
मैंने बोला, “हमने मिलने का वादा किया था…”
अभी वह जो बोली, वे शब्द आज भी मेरे कानों में गूँज रहे हैं
“अब हम ही नहीं मिल सकते हैं, आप क्या मिलोगे।”
निःशब्द हो मैंने फ़ोन रख दिया।