जिनके साथ हम बरसो रहे। हमसाया न सही हमदम रहे। हर हर बार की हाँ, बस एक बार की ना, बरसो का भरोसा पंछी की तरह फुर्र से उड़ गया।
अब ऐसे अनजान से फिरते है जैसे कभी कोई नाता ही न रह हो। दिन रात बिताये जिनके साथ आज अजनबी है।
कभी जिन्होंने इतनी भी जगह नहीं दी कि कोई और आ सके। और आज फासला इतना कि पूरी दुनिया समाए।
कभी हर पल का हिसाब होता था, आज हर पल बेहिसाब है।कभी आते थे आंधी की तरह और जाते थे तूफान की तरह। और अब खामोश है, कोई हलचल ही नही।
रूठे हुए को तो मनाया जा सकता है पर नफरत करने वालो से बात नहीं की जा सकती।
जब आप किसी के लिए आसान हो जाते हो तो वह खुद को कठिन बना लेता है।
खैर ज़िन्दगी है, लोग मिलते और बिछड़ते रहेंगे, खिड़कियां खुली रखो ठंडी हवा एक दिन जरूर आएगी।