मेरे अंदर से एक व्यक्ति हर वक्त बाहर झांकता रहता है। मैं जब भी आईना देखता हूँ, वही नज़र आता है। दाढ़ी बनाते समय मेरे चेहरे के हर भाव में, मेरे उठने , मेरे बैठने, रोने और हंसने में भी उन्ही की छवि दिखाई देती है। उन्हें मैं हर दिन अपने अंदर ही महसूस करता हूं।
उनके जाने के बाद उनकी अच्छाइयों और बुराइयो का आंकलन समाज तो करेगा या कर रहा है और मैं ? मैं उनके जैसा बनना तो कभी नही चाहता था, पर क्या करूँ ?
चाह कर या ना चाहकर उन्ही के जैसा ही हूँ। उसके जाने के बाद मैं उनका ही प्रतिनिधित्व कर रहा हूँ। उन्होंने जो कमाया वही मुझे विरासत में मिल रहा है।
अब मैं अपने आपको उनकी जगह और अपने बेटे को अपनी जगह रख कर जी रहा हूँ। जो व्यवहार उन्हें मेरे साथ करना चाहिए था , मैं बस वही कर रहा हूँ। जो गलत था उसे सुधार रहा हूँ।
वो अब कहीं भी हो अगर वो मुझे देख सुन रहे हो तो उन्हें बताना चाह रहा हूँ कि आपका बेटा आपसे बहुत प्यार करता था, है और रहेगा।