ठंड के दिन चल रहे थे, हम सब रज़ाई ओढ़े दिन काट रहे थे। स्कूल बंद थे। पूरा परिवार भी इकट्टा था, पापा भी आज ऑफिस नही गए थे। हम सब एक साथ बैठ कर मूवी देख रहे थे , जिसमे अदालत मुल्ज़िम को अंत मे फाँसी देती है, और फिर मूवी का नायक उस खलनायक को सरेआम अदालत के बाहर फाँसी पर लटका देता हैऔर मूवी खत्म हो जाती है।
अब चालू होती है, उस मूवी पर चर्चा का खेल।
अचानक पापा बोले, कितना बकवास दिखाते है मूवीज में, ऐसे कोई किसी को भी फाँसी पर चढ़ा सकता है?
पुलिस ऐसे ही देखती रहती है क्या?
इनलोगो ने कभी हकीकत में भी ऐसी फाँसी होती है, सब बकवास दिखाते है, और फिर सोंचते है कि मूवी हिट हो जाये, जरूर यह मूवी पिट गयी होगी।
फाँसी पर चर्चा होने लगी फिर पापा बताने लगे कि कभी वो एक बार फाँसी देखने गए थे।
सच्ची मुच्ची फाँसी, पापा कभी किसी डिपार्टमेंट में रहे होंगे। उन्होंने किसी अधिकारी से बात की होगी, सच मे फाँसी देखने की लिए,फिर उस अधिकारी ने बोला, शर्मा जी आसान नही है फाँसी देखना। बड़े बड़ो की हालत खराब हो जाती है आप देख पाएंगे?
"हम चाहते है कि फाँसी खत्म हो जाये हो और आप फाँसी देखना चाहते है"
तभी पापा और उनके साथियों ने बोला कि देख लेंगे इसमें कौन सी बड़ी बात है। पापा और उनके साथियों को कॉलेज से निकले बस कुछ ही दिन हुए थे। नया खून था और जोश भी भरपूर।
तभी उनके अधिकारी ने बोला तो ठीक है, कुछ महीनों के बाद किसी व्यक्ति को फाँसी होने वाली है जिसने किसी परिवार को बड़े ही वीभत्स तरीके से खेत मे थी काट डाला था। अदालत ने उसे फाँसी की सज़ा सुनाई है।
पापा और उनके साथी बोले, तो ठीक है हम देख लेंगे हम मजबूत है, अधिकारी ने बोला मैं तुम्हे दिन तारीख बात दूंगा। फाँसी का आर्डर तुम लेकर जाना और तुम सबको तड़के जाना पड़ेगा और इस बात की चर्चा आप किसी से नही करेंगे, फाँसी कोई प्रदर्शनी नही है इसलिये, फाँसी आप एक झरोखे से देख पाएंगे ना कि सामने से।
दिन तारीख बताई गई, रात भर कोई सोया ही नही और तड़के सब कारगर पहुँच गए। फाँसी का आर्डर जेलर को दिया गया। फिर उन्हें एक झरोखे तक ले जाया गया, सभी के अंदर उत्सुकता थी फाँसी देखने की, 1 घंटे इंतज़ार करने के बाद फाँसी के हॉल में उस कातिल को लाया गया। कोई अधिकारी उसे कुछ पूछ रहा था, इन लोगो को साफ सुनाई नही दिया। जल्लाद उसे फाँसी के तख्ते पर ले गया और मुँह पर कपड़ा बंधने और फंदा लगा लगाने से पहले उसने खुदा को याद किया और बोला।
"ला इलाहा इल्लल्लाह मोहम्मद रसूलुल्लाह"
उस डाकू के चेहरे का भाव देख, और उसकी आवाज़ के कंपन ने पापा और उनके साथियो को अंदर से हिला दिया, इसके बाद उस हॉल में इतना सन्नाटा था की बयान नही किया जा सकता। मौत का डर उसकी आँखों मे साफ महसूस हो रहा था।
जल्लाद ने इशारा पाते ही उसे फाँसी पर लटका दिया। फिर एक और गहरा सन्नाटा था। सबकी हालत और खराब हों गयी। सब उठे और चल दिये। आपस मे बात करने की भी हिम्मत नही बची थी किसी मे, की फाँसी पर चर्चा कर ले।
पापा के अनुसार कई रातो तक वो फाँसी उनके सपनों में आई। दहशत में आ जाते थे जब भी वो नज़ारा सपने में आता था। पापा के अनुसार उस फाँसी की चर्चा फिर कभी नही हुई आफिस में।
पापा के चेहरे पर वो दहशत दिखाई दे रही थी। हम भी खामोश थे, अपनी जगह चिपक गए हो जैसे। थोड़ी देर बाद माँ ने वो सन्नाटा तोड़ा और बोला चलो खाना खाओ।
आज भी जब मैं लिख रहा हूँ, सन्नाटा आज भी याद आ रहा है।