अब बात आगे बढ़ी, बेटी का पिता अपने अभिभावकों को लेकर लड़के के पिता से मिलने के लिए उनके घर पहुँचे। लड़के के पिता बोले कि, मुझे कुछ नही चाहिए, मेरे पास कार है, सोफा है , मुझे किसी भी चीज़ की कमी नही है, आप जो कुछ भी देंगे अपनी बेटी को देंगे। आप फर्नीचर देंगे तो अपनी बेटी को और वो जहां रहेंगे वही दिलवा दीजियेगा, हमारे बच्चो की माँग, कार की है, बाकी जो सिस्टाचार में देंगे वो तो है ही।
कार की बात सुनते ही बेटी के पिता असहज हो गए, उन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति का व्योरा दिया, कार न दे पाने की अपनी असमर्थता जताई और बोले अगर कार पर आप समझौता करे तो बात आगे बढ़ाई जाए। लड़के के पिता कार से नीचे उतरने को तैयार नही हुए और बोलने लगे, आप कार लोन पर ले कर भी दे सकते है।
लड़की वाले उठे और उन्हें प्रणाम कर, अपने घर की तरफ मुड़ लिए। जब यह बात मेरे कानों तक आयी, तो समझ नही आ रहा था कि हम जैसे नए-नए बने पिताओ को, लड़की कें पैदा होने पर क्या करना चाहिए।
- क्या उसकी शिक्षा पर खर्च करना चाहिए?
- क्या दहेज जमा करने के लिए लड़की को सामान्य पढ़ाई करा कर घर में बैठाना चाहिए?
- क्या सिर्फ एक बोझ समझ कर उसके सामान्य अधिकार छीन लेने चाहिए और सिर्फ दहेज इकट्ठा करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए ?
हम अपनी लड़की को किस दृष्टि से देखे, कही भी बेटी का रिश्ता ले कर जाओ, तो मुँह खुल जाता है दहेज के लिए।
हमने भी विवाह किया , बिना दहेज के लालच के, तो क्या सिर्फ यह एक आदर्शवाद है या इसका धरातल पर कोई अनुकरण भी करता है।
हमने अक्सर यह भी देखा है कि जब लड़की वाला अपनी बेटी की शादी करता है तो दर्द में दहेज दहेज चिल्लाता है और जब वह अपने बेटे की शादी करता है तो खुशी से दहेज दहेज चिल्लाता है।