Tuesday, October 29, 2019

ट्रेन का स्वच्छ भारत अभियान

दीपावली का समय था।  लखनऊ जाने की आपा धापी में, मुझे बड़ी मुश्किल से एक ट्रेन में रिजरवेशन मिला, जिसे सब डबल डेकर के नाम से जानते है।  परिवार के साथ डबल डेकर से मेरा यह पहला सफर था।  सफर कब अंग्रेज़ी का सफर बन गया हमें पता ही नहीं लगा।  ८ घंटे का सफर हमने १५ घंटे में तय किया।  मै अपने इस लेख में, ट्रेन के सफर के बात नहीं, हमारे प्रधान मंत्री द्वारा चलाए गए स्वच्छता अभियान की चर्चा करना चाहता हूं । त्यौहार के समय में ट्रेन खचाखच भरी हुई थी।  


सफर लंबा था इसलिए,  अपने साथ सफरी खाना भी ले कर गए थे।  ट्रेन चलने के बस थोड़ी ही देर के बाद हमने खाना, खाना शरू किया।  खाना खाने के बाद, जो भी कचरा बचा हमने उसे एक जगह इकठ्ठा किया और ट्रेन के डिब्बे में बने कूड़ेदान में डाल दिया।  बाकि यात्री भी या तो कूड़ा, कूड़ेदान में डाल रहे थे या तो अपना कूड़ा एक रेलवे कर्मचारी द्वारा लायी गयी थैली में डाल रहे थे।  सब यही सोंच रहे थे की हम  प्रधान मंत्री द्वारा चलाये गए स्वच्छ भारत अभियान नामक यज्ञ का हिस्सा है।  

ट्रेन धीरे धीरे अपनी मंज़िल की तरफ बढ़ रही थी। कभी वह रुक जाती तो कभी वह तेज रफ्तार में हवा से बातें करने लगती। सफर का आनंद लेते हुए जैसे ही मै हाथ धुलने के लिए, वॉशबेसिन की तरफ बढ़ा। तो देखता क्या हूँ,  एक होनहार रेलवे कर्मचारी, बड़ी शान से, हमारे द्वारा इकठ्ठा किया हुआ कूड़ा, चलती ट्रेन से बहार फेक रहा था।
मैं आश्चर्य चकित था की वह कर्मचारी ऐसा कैसे कर सकता है? क्या उसे कूड़ा प्रबंधन नहीं सिखाया गया है? की कूड़ा कहां और कैसे इकठ्ठा करना है। मैंने उस कर्मचारी को टोकते हुए बोला की, भाई यह तुम क्या कर रहे हो? ट्रेन से बाहर ही फेकना था कूड़ा तो हम ही फेक लेते। तुम्हें क्यों कष्ट देते? अगर तुमने यह कूड़ा ट्रेन से बहार फेका,  तो, मैं तुम्हारी शिकायत उच्च अधिकारी से  कर दूंगा।  तभी डरा सहमा वह कर्मचारी , कूड़ा वही बिखरा हुआ छोड़, वहां से जाने लगा।  जब मैंने उसे दोबारा बुलाया,  तब उसने अपनी जेब से एक थैला निकाला और बिखरा हुआ कूड़ा बटोरा और दो डिब्बों के बीच की जगह में छोड़, वहाँ से चला गया।  

जब मै थोड़ी देर बाद दोबारा उस जगह पर गया,  तो मैंने देखा कि , उस जगह पर न तो वह कर्मचारी था और न ही कूड़ा।  मै उम्मीद करता हूं कि वह कूड़ा ट्रेन की पटरी पर ना फेका गया हो।

Wednesday, October 2, 2019

रमई काका और बहिरे बाबा

मैं आजकल हिमांशु वाजपेई की किताब किस्सा किस्सा लखनउवा पढ़ रहा हूं।  इसी किताब में रमई काका और बहिरे बाबा का किस्सा भी है । उनका ज़िक्र आते ही, बचपन की याद आ गई। बचपने में मां द्वारा गोहराए जाने पर,  उन्हें ना सुन पाने की इस्थिती में , वो अक्सर मुझे बहीरे बाबा कह कर बुलाती थी। रमई काका नाम इस इस्तेमाल हम अक्सर अपने काका को चिढ़ाने में करते थे। आज समझ में आया कि रमई काका और बहीरे बाबा का नाम कहां से आया।