मैं काफी दिनों के बाद, अपने गृह नगर लखनऊ आया हूँ, तो मैंने सोंचा अपने मुहल्ले की सैर पर जाऊं और देखूं की वो कितना बदल गया है सो घर से निकल लिया, एक गली से दूसरी गली, फिर तीसरी गली घूमता ही रहा। जिस गली में भी मैं गया, तो देखता क्या हूँ कि लगभग हर दूसरे घर में दुकान खुली है। कोई किराने की है, तो कोई नमकीन की, कोई रेस्टोरेंट खोल कर बैठा है, तो कोई बेकरी की दुकान चला रहा है। अपने अपने माता पिता के रिटायरमेंट के पैसे के हिसाब से दुकानों में चकाचौंध नज़र आ रही थी।
जिनके बेटे पढ़ लिख गए तो वो घर से चले गए, दूर कही विदेश में अपना जीवन काट रहे है। मैं भी उनमें से एक हूँ। जो बेटा थोड़ा कम पढ़ा लिखा था, बुढ़ापे की लाठी बन, घर के नीचे दुकान खोल अपनी जीविका चला रहा है और वह हर वक्त माँ बाप की सेवा के लिए तत्पर रहता है।
दुकाने इतनी ज्यादा है कि कोई भी चल ही नही रही है। दिन भर दुकान में बैठे बैठे हताशा महसूस होने लगती है पर कोई ग्राहक नज़र आ जाये तो गनीमत है। बेटा निराश होकर कही घर से चला न जाये इसलिए माता पिता अपनी पेंशन का एक हिस्सा अपने बेटे की जरूरतें पूरी करने में व्यय कर रहे है।
मैं अपने परिवार के साथ एक मॉल घूमने गया तो देखता क्या हूँ कि मॉल में बस कुछ ही लोग थे। शनिवार का दिन होने के बाद भी कोई हलचल नही थी। नोएडा जैसे शहर में शनिवार और रविवार को तो मॉल में पाव रखने की ज़मीन नही होती है और यहां पर तो सन्नाटा पसरा हुआ था। इक्का दुक्का दुकानों पर लोग नज़र आ रहे थे पर उनमें से भी ज़्यादातर लोग विंडो शॉपिंग वाले थे। इतनी महँगी महँगी दुकाने ले कर महँगा महँगा समान डालकर दुकाने चला रहे है पर चल नही रही है। यहाँ के यूथ के पास इतना पैसा ही नही है कि वो मॉल में जाये और कुछ खरीदारी करे।
स्टार्टअप ने नाम पर सबके माँ बाप ने दुकाने खुलवा दी है अपने बुढ़ापे का सहारा बनाने के लिए। देखता हूँ कब तक मोदी का स्टार्टअप इंडिया काम करता है। उम्मीद करता हूँ कि भविष्य सुनहरा हो न सिर्फ हमारा बल्कि देश का भी।