हम कुछ ही दिन पूर्व ही शहर की घनी आबादी वाले इलाके से निकल उसी शहर की बाहरी इलाके में एक बहुमंजिला ईमारत में शिफ्ट हुए है। शरू के कुछ दिन में हमने बिलकुल भी अच्छे नहीं लगे। उस इलाके में हमारा कोई जानने वाला भी ना था। एक सुबह देखता क्या हूँ एक नन्ही से गौरैया हमारे कमरे में दाखिल होती है। गर्मियों के दिन थे इसलिए हमने पंखा चला रखा था। गौरैया के आता देख हम झट से पंखे को ऑफ करने के लिए बढे। की कही चिड़िया को पंखे से चोट न लग जाये।
पंखा बंद तो हो गया पर चिड़िया बहार जाने का नाम ही नहीं ले रही थे, कभी परदे की रोड पर बैठ जाती तो कभी बंद पंखे के पारो पर। भगाये तो कैसे भगाये फिर हमने कमरे की सारी लाइट्स बंद की और सिर्फ एक ही दरवाज़ा खोला। अचानक चिड़िया फुर से उस गयी।
चिडियो को देख कर ना जाने क्यों हमे बहुत अच्छा सा लगा। शहर की उस घनी आबादी में लोग तो बहुत थे बार कोई भी गौरैया नहीं थी। हर जगह से गौरैया ख़त्म सी हो गयी है। चहचहाने की की आवाज़े तो हमने बरसो बाद सुनी थी। मानो ऐसा लग रहा था की हम किसी जीवित जगह आ गए है।
अब हम रोज़ चिडियो को अपनी बालकनी में दाना डालते है और जिस दिन भी हम भूल जाते थे चिडियो का चहचहाना बहुत ही बढ़ जाता है। कुछ तो घर के अंदर आकर मानो हमे बताने का प्रयाश कर रही होती है की हम दाना डालना भूल गए हो। हम झट से दरवाज़ा खोल दाना डालते है। साथ में कुछ कबूतर भी दानो का मज़ा लेते है।